ग्लोबल वार्मिग और वायु प्रदूषण की रोकथाम के लिए जैविक ईंधन का उपयोग जरुरी
ग्लोबल वार्मिग और वायु प्रदूषण की रोकथाम के लिए जैविक ईंधन का उपयोग जरुरी |Syed Dabeer Hussain - RE
राज ख़ास

कार्बन डाइआक्साइड के उत्पादन को कम करने के लिए जरुरी है जैविक ईंधन

जिस गति से वातावरण में कार्बन डाइआक्साइड की मात्र बढ़ी है, वह 25 लाख वर्ष पहले दुनिया से आखिरी हिम युग खत्म होने के समय हुई वद्धि से 100 गुना अधिक है।

राज एक्सप्रेस

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राज एक्सप्रेस, भोपाल। 2015 में पेरिस जलवायु समझौते के तहत इस सदी के अंत तक वैश्विक तापमान वृद्धि को औद्योगिक काल से पहले के तापमान से दो प्रतिशत से कम रखना तय हुआ था लेकिन उसका पालन नहीं हुआ। यह तभी हो सकता है जब पूरी दुनिया जैविक ईंधन का विकल्प अपनाए। अब तक भारत समेत 19 देश इस दिशा में आगे बढ़ चुके हैं। अब बाकी बचे देशों को भी इस ओर ध्यान देना होगा।

अच्छी बात है कि विकसित देशों का हृदय परिवर्तन हो रहा है और तय कर लिया है कि वह कार्बन डाइआक्साइड के उत्पादन को वातावरण में कम करने के लिए कोयले की परियोजनाओं से दूर रहेंगे। याद होगा कि गत वर्ष कोप 23 नाम के संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण परिवर्तन सम्मेलन में ग्लोबल वार्मिग और वायु प्रदूषण की रोकथाम के लिए जैविक ईंधन के इस्तेमाल के लिए भारत समेत 19 देशों ने अपनी सहमति की मुहर लगाई। सम्मेलन के घोषणा पत्र में कहा गया कि पृथ्वी पर ग्लोबल वार्मिग दो डिग्री सेल्सियस से कम पर ही सीमित करने के लिए विकसित देशों को हर हाल में वर्ष 2030 तक कोयले से मुक्त होना होगा। बाकी दुनिया में कोयले का इस्तेमाल बंद करने को लेकर 2050 तक की समय सीमा निर्धारित की गई। उल्लेखनीय है कि जैविक ईंधन पर सहमति जताने वाले ये 19 देश दुनिया की आधी आबादी रखते हैं व अर्थव्यवस्था में इन देशों की वैश्विक हिस्सेदारी 37 प्रतिशत है। अगर 19 देश (भारत, अर्जेटीना, ब्राजील, कनाडा, चीन, डेनमार्क, मिस्र, फिनलैंड, फ्रांस, इंडोनेशिया, इटली, ब्रिटेन, मोरक्को, मोजांबिक, नीदरलैंड, पैरागुए, फिलीपींस, स्वीडन और उरुग्वे) जैविक ईधन के इस्तेमाल को बढ़ावा देते हैं तो ग्लोबल वार्मिग व वायु प्रदूषण को नियंत्रित किया जा सकेगा।

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