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दूषित जल से लोगों को हो रही बीमारियां
दूषित जल से लोगों को हो रही बीमारियां|Syed Dabeer Hussain - RE
राज ख़ास

दूषित जल से बढ़ेंगी मुश्किलें

प्रदूषित पानी की वजह से लोगों को पीलिया, डायरिया व टायफायड जैसी बीमारियों का शिकार होना पड़ रहा है। अगर हम जिम्मेदार नहीं बनेंगे तो, यह समस्या और बढ़ेगी।

राज एक्सप्रेस

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राज एक्सप्रेस। साधन संपन्न लोगों ने तो घर में आरओ की फिल्टर मशीन लगा कर शुद्ध पानी का प्रबंध कर रखा है, लेकिन साधारण लोगों के पास ऐसी व्यवस्था नहीं होने के कारण इनके सामने नाले से गुजरते जर्जर पाइप का दूषित पानी पीने के सिवा दूसरा कोई चारा नहीं। प्रदूषित पानी का नतीजा है कि, लोगों को पीलिया, डायरिया व टायफायड जैसी बीमारियों का शिकार होना पड़ रहा है। यह समस्या और बढ़ेगी, अगर हम जिम्मेदार नहीं बनेंगे।

नीति आयोग की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि, देश में 70 प्रतिशत जल की आपूर्ति दूषित हो रही है। सेफ वाटर नेटवर्क की रिपोर्ट के मुताबिक, भी जल गुणवत्ता सूचकांक के 122 देशों में भारत का स्थान 120वां है। इस रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2050 तक बढ़ती आबादी व जल के बढ़ते कारोबारी इस्तेमाल की वजह से प्रति व्यक्ति जल की खपत में 40 से 50 प्रतिशत तक की गिरावट आ सकती है। वाटर एड की रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में 16.3 करोड़ लोग स्वच्छ जल पीने से महरूम हैं। शहरी इलाकों में अधिकांशत: झुग्गी-झोपड़ियों में रहने वाले लोग पीने योग्य जल से महरूम हैं। शहर के ऐसे इलाकों में पाइपलाइन बिछाना भी मुश्किल है। लिहाजा, झुग्गी-झोपड़ियों में रहने वाले लोगों के लिए जल के छोटे-छोटे उपक्रमों को स्थापित करने की बड़ी जरूरत है। सेफ वाटर नेटवर्क की रिपोर्ट के अनुसार, शहरों के झुग्गी-झोपड़ियों में रहने वाली 37 करोड़ की आबादी को साफ जल मुहैया कराने के लिए सरकार को 2.2 लाख जल के छोटे-छोटे उपक्रम स्थापित करने होंगे, जिनकी लागत 44 हजार करोड़ रुपए के आस-पास होगी।

यहां सवाल का उठना लाजिमी है कि, क्या सरकार सभी नागरिकों को साफ जल उपलब्ध कराने के लिए तैयार है? सवाल सरकार द्वारा सभी घरों तक पीने योग्य जल पहुंचाने के लिए आधारभूत संरचना विकसित करने की भी है। सभी के घरों तक जल पहुंचाने के लिए पाइप लाइन की जरूरत है। देश की 82 करोड़ आबादी आज भी पाइपलाइन से जल नहीं पी रही है। समस्या गांवों में जल को पीने योग्य बनाने की भी है। वहां जल को साफ करने की कोई बुनियादी सुविधा उपलब्ध नहीं है। ग्रामीण आबादी अभी भी नदी, कुएं, तालाब से सीधे जल पी रही है, जिससे उनके स्वास्थ्य को भारी खतरा है। वर्ष 2014 में दूषित जल को साफ करने वाले 12 हजार सयंत्र उपलब्ध थे, जो 2018 के अंत तक बढ़कर 50 हजार हो गए हैं। सेफ वाटर नेटवर्क के मुताबिक, अगर जल को साफ करने की पहल के लिए सरकारी नीति बनाई जाती है, तो वर्तमान स्थिति मे जरूर बेहतरी आ सकती है। हालांकि, सरकार ने वर्ष 2030 तक सभी घरों में पाइपलाइन के जरिए पीने योग्य जल पहुंचाने का लक्ष्य रखा है, जिस पर पांच लाख करोड़ रुपए की आधारभूत संरचना विकसित करनी होगी।

भारत की ग्रामीण इलाकों में लगभग 63 करोड़ लोग ऐसे हैं, जो आज भी दूषित जल पीने के लिए मजबूर हैं, जबकि 2017 में विश्व जल दिवस के दिन संयुक्त राष्ट्र संघ ने साफ जल पीना इंसान का बुनियादी हक बताया था। वर्ष 2008 की एक रिपोर्ट के मुताबिक, भारत की 88 प्रतिशत आबादी के पास जल उपलब्ध था, लेकिन शहरी क्षेत्र में पीने योग्य पानी तक पहुंच केवल 31 प्रतिशत आबादी की थी, जबकि ग्रामीण इलाकों में यह प्रतिशत महज 21 थी। हमारे देश पर पकृति शुरू से मेहरबान रही है। प्रकृति ने हमें घने जंगल, बड़ी-बड़ी नदियां, तालाब और झील जैसी प्राकृतिक संसाधनों से नवाजा है, लेकिन हम अपनी लालची प्रवृति की वजह से धीरे-धीरे इन्हें खत्म करने पर तुले हैं। मौजूदा स्थिति को दृष्टिगत करके अनुमान लगाया जा रहा है कि, वर्ष 2025 तक हमारे देश में जल की भारी कमी हो जाएगी। उपलब्ध पानी भी पीने योग्य नहीं होंगे। ऐसा नहीं है कि, सरकार संकट से अंजान है। बावजूद इसके सरकार की नीतियां जल को दूषित करने और जलसंकट को बढ़ावा देने वाली है। सरकार की मेक इन इंडिया की संकल्पना को साकार करने के लिए भारी मात्र में पानी की जरूरत है।

इस समय कोई भी कल-कारखाना जल के बिना नहीं चल सकता है। कल-कारखानों को जल को दूषित करने वाला सबसे बड़ा कारक माना जा सकता है। सरकार 100 स्मार्ट सिटी भी बनाना चाहती है, जिनके निर्माण के लिए भारी मात्र में जल की जरूरत होगी। देश की प्रमुख नदी यमुना मर चुकी है। हिंडन का भी स्वर्गवास हो गया है। गंगा नदी भी वेंटीलेटर पर है। बावजूद इनके, सरकार कागजों पर इन्हें पुनर्जीवित करने का दावा कर रही है। जल के वाष्पीकरण, अपवाह या उपसतही जल निकासी से होने वाले नुकसानों का कम करने, भूमि की सिंचाई के लिए जल की जरूरत का निर्धारण करने, वाष्पीकरण को नियंत्रित करने, खेतों में जल का समान वितरण सुनिश्चित करने, सिंचाई के तरीकों में बदलाव लाने, ड्रिप सिंचाई विधि को बढ़ावा देने, अधिक से अधिक पौधा रोपन या वृक्षारोपण करने, वर्षा के जल को सहेजने आदि की मदद से मौजूदा स्थिति में बदलाव लाया जा सकता है।

जल प्रबंधन आज हमारी सबसे बड़ी प्राथमिकता होनी चाहिए, लेकिन अभी भी हम इसकी अहमियत नहीं समझ पाए हैं। जल-संरक्षण के कार्यान्वयन या जल-दक्षता उपायों को अपनाते हुए जल-प्रयोग में कमी लाने की जरूरत है। जल संरक्षण का उपाय एक क्रिया भर है, जिसे आदतों में लाकर सफल बनाया जा सकता है। दूषित जल पीने से हम जीवित तो जरूर रह सकते हैं, लेकिन हमारी आयु कम हो सकती है। हम कई तरह की बीमारियों से पीड़ित हो सकते हैं। दूषित जल से फसलों की गुणवत्ता भी प्रभावित होती है। वस्तु, खेती-किसानी के लिए स्वस्थ पानी और पीने के लिए स्वच्छ पानी की जरूरत है। दूषित जल में हजारों की संख्या में कीटाणु होते हैं, जो हमारी मौत के कारक बनते हैं। हालांकि, दूषित जल को उबालकर, कैन्डल वाटर फिल्टर, क्लोरीनेशन, देशी विधि से शुद्धिकरण, हैलोजन टैबलेट व आरओ सिस्टम, यूवी रेडिएशन प्रणाली आदि की मदद से इसे शुद्ध किया जा सकता है, लेकिन इन प्रक्रियाओं से शिक्षा और जानकारी के अभाव में कुछ ही लोग जल को शुद्ध कर सकते हैं।

कहा जा सकता है कि, दूषित जल एक गंभीर मसला है, जिसके निदान के लिए सरकार तो कोशिश करने में जुटी है, लेकिन यह हमारी भी जिम्मेदारी है कि, हम स्थिति को बेहतर करने के लिए पहल करें। अगर समय रहते अपनी मानसिकता एवं आदतों में बदलाव नहीं लाएंगे तो हम खुद ही अपनी नियति के लिए जिम्मेदार होंगे। धरती के जल के दूषित होने के बाद अब समुद्र के खारे जल को पीने योग्य बनाने की पहल की जा रही है। वैज्ञानिकों ने ऐसा खास फिल्टर तैयार किया है जिससे समुद्र के बेस्वाद पानी को पीने के लायक बनाया जा सकेगा। यूनिवर्सिटी ऑफ मैनचेस्टर के वैज्ञानिकों की एक टीम ने यह उपकरण बनाया है। इससे दूषित पदार्थो को छानने में सफलता मिली है। यह खोज भविष्य के लिए वरदान साबित हो सकती है। हाल ही में संयुक्त राष्ट्र ने चेतावनी दी थी कि, 2025 तक दुनिया के 1.20 अरब लोगों को साफ पानी मिलने में मुश्किलों का सामना करना पड़ेगा।

वैज्ञानिकों के बनाए फिल्टर से पानी से नमक को निकाला जा सकता है और उसे पीने योग्य बनाया जा सकता है। मानव जनित जलवायु परिवर्तन के कारण शहरों में पानी की आपूर्ति पर असर पड़ा है। ऐसे में कई देश डीसैलिनैशन (विलवणीकरण-पानी से लवणों को निकालने की प्रक्रिया) पर काफी खर्च कर रहे हैं। मैनचेस्टर में टीम का नेतृत्व करने वाले प्रोफेसर राहुल नायर ने बताया कि यह आगे बढ़ने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। इससे डीसैलिनैशन तकनीक को और बेहतर करने दिशा में नए संभावनाओं का द्वार खुलेगा।