कश्मीर में युवाओं का आतंकी संगठनों में भर्ती होना चिंता बढ़ा रहा है
एक साल में जम्मू कश्मीर में सेना ने काफी हद तक आतंकवाद पर काबू पाया है, मगर यह चुनौती अभी बरकरार है। कश्मीर में युवाओं का आतंकी संगठनों में भर्ती होना सुरक्षा बलों की चिंता बढ़ा रहा है।

पिछले एक साल में जम्मू कश्मीर में सेना और सुरक्षाबलों ने काफी हद तक आतंकवाद पर काबू पाया है, पर यह चुनौती अभी बरकरार है। घाटी में बढ़ती राजनीतिक सक्रियता से आतंकी संगठनों की नींद उड़ी हुई है। पिछले एक सप्ताह में उन्होंने जिस तरह से सेना के काफिले और शिविरों पर छोटे हमले किए हैं, वह यही साबित कर रहा है। लगभग हर दिन दो से तीन आतंकियों को सेना ढेर कर रही है। मगर चिंता यह है कि आतंकी संगठनों से जुडऩे वाले स्थानीय युवकों की संख्या में इजाफा हो रहा है। ये युवक न सिर्फ आतंकी बन रहे हैं, बल्कि सीमा पार से आने वाले आतंकियों को घाटी में रास्ते भी दिखा रहे हैं। पिछले दिनों एक के बाद एक नेताओं की हत्या इसी का सबूत है। आतंकी संगठनों की फंडिंग पर नजर रखने वाली वैश्विक संस्था वित्तीय कार्रवाई कार्यबल (एफएटीएफ) की लटकती तलवार और घाटी में सुरक्षा बलों की जबरदस्त सती के बावजूद जम्मू कश्मीर में पाकिस्तानी सेना की नापाक हरकत जारी है। एक साल में आतंकी संगठन जैश-ए-मोहम्मद ने कश्मीर के 45 युवकों को अपने संगठन में शामिल किया है।

एजेंसियों के आंकड़ों के मुताबिक पिछले साल 14 फरवरी को पुलवामा आतंकी हमले के बाद खासतौर पर दक्षिण कश्मीर से युवकों को गायब होने की घटना में तेजी से इजाफा हुआ है। दो साल में गायब होने वाले युवकों की संया 80 से ऊपर रिकार्ड की गई है। इनमें से ज्यादातर आतंकी संगठन के संपर्क में हैं, जिनकी अलग-अलग स्तर पर ट्रेनिंग चल रही है। पुलवामा हमले के आत्मघाती आतंकी आदिल डार को बुरहान वानी की तर्ज पर शहीद और हीरो बताकर युवकों को आतंक की तरफ आने के लिए गुमराह किया जा रहा है। अगस्त 2019 में जम्मू कश्मीर में अनुच्छेद-370 हटाने के बाद घाटी में आतंकी संगठनों ने तबाही की कई खतरनाक योजनाएं बनाई थीं। हालांकि सुरक्षा एजेंसियों की कार्रवाइयों में लगातार जैश और अन्य संगठनों के आतंकवादी मारे जा रहे हैं। हालांकि, दूरदराज के इलाकों से युवकों का आतंकी संगठनों में शामिल होने से चुनौती बढ़ती जा रही है।

कश्मीर में पिछले कुछ समय से राजनीतिज्ञों और कार्यकर्ताओं पर बढ़ते आतंकी हमले गंभीर चिंता पैदा करने वाले हैं। आतंकी चुन-चुन कर राजनीतिक दल विशेष के स्थानीय नेताओं और कार्यकर्ताओं को निशाना बना रहे हैं, ताकि घाटी में किसी भी तरह से राजनीतिक गतिविधियां शुरू न हो सकें। ये हमले सेना, सुरक्षाबलों, पुलिस और प्रशासनिक तंत्र के लिए गंभीर चुनौती बनते जा रहे हैं। पिछले साल पांच अगस्त को जम्मू कश्मीर से अनुच्छेद 370 को खत्म करने के बाद यह उम्मीद बनी थी कि घाटी में अब आतंकवाद पर लगाम लगेगी और कश्मीरी जनता राहत की सांस लेगी। लेकिन अभी भी जिस तरह आतंकी संगठन सक्रिय हैं, उससे तो यह लग रहा है कि आतंकियों के पूरी तरह सफाए में अभी वक्त लगेगा।

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