पत्रकारिता का फकीर 'सत्यनारायण'

मध्यप्रदेश के वरिष्ठ पत्रकार सत्यनारायण श्रीवास्तव का जीवन भले ही फकीरी से भरा रहा हो, मगर उन्होंने साथी पत्रकारों और समाज को देने में कभी भी कंजूसी नहीं दिखाई।
पत्रकारिता का फकीर 'सत्यनारायण'
पत्रकारिता का फकीर 'सत्यनारायण'Social Media

राज एक्सप्रेस। मध्यप्रदेश के वरिष्ठ पत्रकार सत्यनारायण श्रीवास्तव का जीवन भले ही फकीरी से भरा रहा हो, मगर उन्होंने साथी पत्रकारों और समाज को देने में कभी भी कंजूसी नहीं दिखाई। उनके जैसा पत्रकार वास्तव में समाज को दिशा दिखाने वाला था। वे न सिर्फ बेहतर व्यक्तित्व के धनी थे, बल्कि दूरदर्शी भी थे।

स्वर्गीय सत्यनारायण श्रीवास्तव मप्र के परिवर्तन काल के प्रत्यक्षदर्शी पत्रकार थे। उन्होंने वर्ष 1956 में मध्यप्रदेश को जन्म लेते देखा व तब की राजनीति एवं राजनेताओं को उनके वास्तविक स्वरूप में देखा तथा घटनाओं को निस्प्रह भाव से विश्लेषित किया। उनके पत्रकारिता जीवन में पत्रकारिता के सिद्धांत, आदर्श और लक्ष्य भी परिवर्तित हो रहे थे। स्वतंत्रता से पहले का ‘जो घर बारे आपनों’ का शहीदी मनोभाव पत्रकारिता से विलुप्त होने की ओर बढ़ रहा था और पत्रकारिता घर बसाने का माध्यम बनता जा रहा था। पत्रकारिता में धन का प्रवेश बढ़ता जा रहा था और व्यवसायियों का नियंत्रण होता जा रहा था। अद्भुत यह था कि पत्रकारिता के बदलते जा रहे लक्ष्यों के बीच भी सत्यनारायण श्रीवास्तव का मन फकीरी में ही लगा रहा।

डॉ. शंकरदयाल शर्मा की पहल पर जब मालवीय नगर में पत्रकारों को नाम मात्र की कीमत पर बड़े और मूल्यवान प्लाट आवंटित किए गए तो अनेक पत्रकार प्लाट के मूल्य और मकान के निर्माण के लिये धन की ‘व्यवस्था’ करने में सफल हो गए जबकि सत्यनारायण श्रीवास्तव खादी के कुरते-पजामें में ही चप्पल चटकाते और नि:स्वार्थ भाव तथा पत्रकारिता के आदर्शों के गीत गाते रह गए। उस समय कहा यह जाता था कि सत्यनारायण जी, जिन्हें अपनत्व से मित्र ‘सत्तू भैया’ कह कर पुकारते थे, डॉ. शंकरदयाल शर्मा के अत्यंत विश्वासपात्र पत्रकार थे। यहां एक उदाहरण ही बताता है कि सत्तू भैया संबंधों को धन में रूपांतरित करने की कला से या तो अनभिज्ञ थे अथवा कभी इस कलाकारी को उन्होंने अपने जीवन में प्रविष्ट नहीं होने दिया।

किंतु ऐसा नहीं कि राजनेताओं से संबंधों को उन्होंने अपने लिए नहीं तो किसी के लिए भी लाभ नहीं उठाया। वे किसी भी पत्रकार और पत्रकार ही नहीं, किसी भी परिचित की समस्या सुलझाने किसी भी मंत्री के पास जाकर अड़ जाने में संकोच नहीं करते थे। उस जमाने में बलभद्र प्रसाद तिवारी नाम के बड़े खतरनाक पत्रकार माने जाते थे। खतरनाक इसलिए क्योंकि उनके साप्ताहिक अखबार में कब किसकी टोपी उछल जाए और कब कौन वस्त्र विहीन हो जाए, कहा नहीं जा सकता था। वे तलैया से इब्राहिमपुरा जाने वाले मार्ग पर छोटी सी जगह में रहते और छोटी सी प्रेस चलाते थे। तत्कालीन मुख्यमंत्री गोविंद नारायण सिंह के जमाने में उनका जर्जर निवास अपनी अंतिम सांसे गिनने लगा, तो बात यह आई कि उनके लिए सरकारी आवास आवंटित करवाया जाए।

तब दैनिक भास्कर के संपादक तो गोवर्धनदास मेहता होते थे, किंतु भास्कर में संपादक के सारे कार्य और इतर कार्य भी श्यामसुन्दर ब्यौहार देखते थे। श्री ब्यौहार और सत्तू भैया नरसिंहपुर जिले के ही थे, अत: बचपन के मित्र थे। श्री ब्यौहार ने सत्तू भैया को मित्रवत् आदेश दिया कि उन्हें श्री तिवारी को मकान आवंटित करवाना है। सत्तू भैया असमंजस में पड़े। गोविन्द नारायण सिंह से उनके संबंध तो प्रगाढ़ थे, किंतु बलभद्र तिवारी ने अपने साप्ताहिक में गोविन्द नारायण सिंह के व्यक्तिगत जीवन को लेकर क्रमिक रूप से कटु आलोचना छापी थी। खैर सत्तू भैया ने पत्रकार मित्र के लिए साहस जुटाया और उन्हें लेकर गोविंद नारायण सिंह जी के पास पहुंच गए। कहते हैं गोविंद नारायण सिंह जी ने कहा सत्तू तुम जिसे लेकर आए हो उसने अपने अखबार में हमें खूब गालियां दी हैं, मगर तुम लाए हो और हम ठाकुर तथा यहां ब्राम्हाण है तो हम मकान अलाट कर देते हैं।

पता नहीं सत्तू भैया ने गोविंद नारायण सिंह के इस अहसान का बदला कैसे चुकाया, मगर बलभद्र तिवारी पर उन्होंने अपना अहसान कभी भी नहीं जताया। पत्रकारिता में सत्तू भैया मुझसे बहुत वरिष्ठ थे, किंतु मुझ पर उनका स्नेह प्रगाढ़ था। मैं पढ़ता और अखबारों में नौकरी करता तथा छोड़ता रहा था। अत: प्रारंभ में टुकड़ों-टुकड़ों में ही उनसे भेंट होती रहती थी। फिर जब एमए करने के बाद मैं पूर्णकालिक पत्रकार हो गया, तब उनसे प्राय: भेंट होने लगी। मैं नहीं जानता कि उनका मेरे प्रति अपार प्रेम क्यों था, किंतु कई प्रमुख राजनेताओं से मेरा प्रथम परिचय उन्हीं के साथ हुआ था। जब गोविंद नारायण सिंह मुख्यमंत्री बने तब मैं भास्कर छोड़ कर नए निकले अखबार ‘मध्यप्रदेश’ में चला गया था। वे प्राय: कहीं मिलने जाते तो मुझे फोन कर लेते और अक्सर उनके साथ जाकर मंत्रियों से मिलता एवं उन सलीकों को सीखता, जिनके माध्यम से समाचारों को निकाला जाता था। गोविंद नारायण सिंह जी से मेरा पहला परिचय उन्हीं के साथ हुआ था और उन दोनों में अनौपचारिक प्रगाढ़ संबंध देख कर मैं चकित था।

गोविंद नारायण सिंह कई बार तो मेरे सामने ही उनसे मजाक कर लेते और अपने व्यक्तिगत जीवन की बातें भी कर लेते। जब तक मैं मध्यप्रदेश में रहा दोपहर में अक्सर हमारी भेंट हमीदिया अस्पताल वाले चौराहे पर कौने की पान की दुकान पर हो जाती। वहां वे सिगरेट पीते और मैं पान खाता। इस भेंट के लिए प्राय: हम एक-दूसरे को फोन कर लेते थे। सुविधा जनक इसलिए था, क्योंकि कायस्थपुरा से निकलने वाले मध्यप्रदेश एवं नूरमहल मार्ग से निकलने वाले दैनिक जागरण के मध्य में हमीदिया अस्पताल का चौराहा पड़ता था। यहां वे बातों ही बातों में कई राजनीतिक जानकारियां दे देते। यह सिलसिला कुछ समय तक ही चला, उसके बाद मैं मध्यप्रदेश छोड़ कर पुन: दैनिक भास्कर में चला गया और सत्तू भैया भी किन्हीं अज्ञात परेशानियों से घिरे हुए लगने लगे। लंबे अरसे बाद उनसे प्रतिदिन और लंबी मुलाकात एवं बातचीत का अवसर मुझे तब मिला जब वे 1977 से 1979 के मध्य कुछ समय के लिए दैनिक भास्कर में राजनीतिक रिपोर्टर के रूप में आए। राजनीति और राजनीतिज्ञों के बारे में उनकी गहरी जानकारी और अपनी रिपोर्ट को संदर्भ सहित विश्लेषणात्मक ढंग से प्रस्तुत करने की क्षमता को देखा। परोक्ष रूप से उनके द्वारा निकाले गए निष्कर्ष प्राय: भविष्य में प्रत्यक्ष रूप धारण करते और चुटीली एवं चमकदार उक्तियां पाठक को आनंदित करतीं।

शायद वह काल था जब वह व्यवसायिक पत्रकारिता के दबावों से विचलित रहने लगे थे। उन्होंने अपने राजनीतिक संपर्को एवं संबंधों के माध्यम से न केवल अपने मित्रों को लाभ पहुंचाया बल्कि कई राजनीतिक घटनाओं को प्रभावित भी किया। साथ ही कई राजनेताओं को फर्श से अर्श तक पहुंचाने में भी सहयोग किया। तब यह तथ्य प्रचारित था कि दैनिक जागरण के मालिक और प्रधान संपादक गुरुदेव गुप्त के संसद सदस्य बनने में सत्तू भैया की ही प्रमुख भूमिका थी। राजनीतिज्ञों ने उनके नि:स्वार्थ स्वभाव व लापरवाह जीवन का दोहन तो किया किन्तु उनके वास्तविक जीवन के बारे में शायद कोई चिंता नहीं की। पिछले दिनों जब भोपाल में मालवीय नगर स्थित पत्रकार भवन को ढहाया गया, तब मुझे उनके कहे हुए शब्द याद आए। उन्होंने कहा था बूढ़े हो रहे पत्रकार पत्थर पर नाम खुदवा लेने के लिए पत्रकार भवन बनवा तो रहे हैं, मगर आने वाली पीढ़ी को देखते हुए एक दिन यह झगड़े की जड़ बनेगा। यादवी संघर्ष में पत्रकार भवन तो नष्ट होगा ही पत्रकारों की प्रतिष्ठा को भी ले डूबेगा। अंतत: वही हुआ। मुझे अग्रज की तरह स्नेह करने और पत्रकारिता के अनेक गुर बताने वाले मेरे सत्तू भैया की स्मृति को प्रणाम।

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