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भारतीयता के ध्वजवाहक स्वामी विवेकानंद
भारतीयता के ध्वजवाहक स्वामी विवेकानंद|Pankaj Baraiya - RE
राज ख़ास

भारतीयता के ध्वजवाहक ''स्वामी विवेकानंद''

स्वामी विवेकानंद जी की दृष्टि में समाज की बुनियादी इकाई मनुष्य था। उसके उत्थान के बिना वे देश के उत्थान को अधूरा मानते थे, उनका दृष्टिकोण था, राष्ट्र का वास्तविक पुनरुद्धार मनुष्य-निर्माण से प्रारंभ।

राज एक्सप्रेस

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राज एक्‍सप्रेस। स्वामी विवेकानंद जी की दृष्टि में समाज की बुनियादी इकाई मनुष्य था। उसके उत्थान के बिना वे देश के उत्थान को अधूरा मानते थे। उनका दृष्टिकोण था कि, राष्ट्र का वास्तविक पुनरुद्धार मनुष्य-निर्माण से प्रारंभ होना चाहिए। मनुष्य में शक्ति का संचार होना चाहिए जिससे कि, वह मानवीय दुर्बलताओं पर विजय पाने में और प्रेम, आत्मसंयम, त्याग, सेवा एवं चरित्र के अपने सद्गुणों के जरिए उठ खड़ा होने का सामर्थ्‍य जुटा सके।

1893 में शिकागो में धर्म सम्‍मेलन (पार्लियामेंट ऑफ रिलीजन) में स्वामी विवेकानंद ने अपने ओजस्वी विचारों से अतीत के अधिष्ठान पर वर्तमान और वर्तमान के अधिष्ठान पर भविष्य का बीजारोपण कर विश्व की आत्मा को चैतन्यता से भर दिया था। उन्होंने पश्चिमी विचारधारा पर प्रहार करते हुए स्पष्ट कहा था कि, ‘मेरी धारणा वेदान्त के इस सत्य पर आधारित है कि, विश्व की आत्मा एक और सर्वव्यापी है। पहले रोटी और फिर धर्म। लाखों लोग भूखें मर रहे हैं और हम उनके मस्तिष्क में धर्म ठूंस रहे हैं। मैं ऐसे धर्म और ईश्वर में विश्वास नहीं करता, जो अनाथों के मुंह में एक रोटी का टुकड़ा भी नहीं रख सकता।’ उन्होंने सम्‍मेलन में उपस्थित अमेरिका और यूरोप के धर्म विचारकों एवं प्रचारकों को झकझोरते हुए कहा कि, ‘भारत की पहली आवश्यकता धर्म नहीं है। वहां इस गिरी हुई हालत में भी धर्म मौजूद हैं। भारत की सच्ची बीमारी भूख है। अगर आप भारत के हितैषी हैं तो उसके लिए धर्म प्रचारक नहीं अन्न भेजिए।’