फिल्मफेयर अवार्ड जीतने वाले "गोपालदास नीरज" की काव्य यात्रा
फिल्मफेयर अवार्ड जीतने वाले "गोपालदास नीरज" की काव्य यात्राPriyanka Yadav-RE

फिल्मफेयर अवार्ड जीतने वाले "गोपालदास नीरज" की काव्य यात्रा...

Gopal Das Neeraj: मायानगरी में हमेशा के लिए फंसकर नहीं रहेंगे बल्कि इसे अलविदा कहकर लौट जाएंगे। उन्होंने अपने इन शब्दों को जिया भी।

राज एक्सप्रेस। गीत-गजलों से लोगों के दिलों में प्रेम और सिर्फ प्रेम के स्वरों को अलंकृत करने वाली हिंदी कविता की मधुर वीणा खामोश हो गई। लेकिन इस वीणा से निकले हजारों-लाखों गीत सालों तक लोगों के दिलों में प्यार की स्वरलहरियां बिखेरते रहेंगे। महाकवि गोपालदास नीरज (Gopal Das Neeraj) की कविताएं आज भी साहित्यप्रेमियों के दिलो में राज करती हैं, 1940 के दशक के अंत से वह कवि सम्मेलनों के मंच पर अपनी कविता और सस्वर प्रस्तुति के लिए तत्कालीन युवा वर्ग के चहेते हुए थे। मानव संवेदनाओं के सम्मोहक कवि पर आज मौत भी सम्मोहित हो गई।

वे कहते थे कि, वह इस मायानगरी में हमेशा के लिए फंसकर नहीं रहेंगे बल्कि इसे अलविदा कहकर लौट जाएंगे। उन्होंने अपने इन शब्दों को जिया भी। गीतिकाव्य की दुनिया में वह लौट आए। मंचों, पुस्तकों, पत्रिकाओं की दुनिया में वह जीते रहे।

कवि सम्मेलनों के मंच पर करते थे राज :

हिंदी कवि सम्मेलनों के लाड़ले नीरजजी ने हिंदी कविता को नई उचाइयां दी हैं। दशकों तक कवि सम्मेलनों के मंच पर राज करने वाले गीतों के राजकुमार नीरजजी ये पंक्तियां बड़े ही मस्त होकर सुनाते थे और श्रोता इस पर खूब झूमने लगते थे। "बादलों से सलाम लेता हूं, वक्त के हाथ थाम लेता हूं। मौत भी रुक जाती है पल भर के लिए, जब मैं हाथों में जाम लेता हूं।" उनका यह शेर आज भी मुशायरों में फरमाइश के साथ सुना जाता है: इतने बदनाम हुए हम तो इस ज़माने में, लगेंगी आपको सदियाँ हमें भुलाने में। न पीने का सलीका न पिलाने का शऊर, ऐसे भी लोग चले आये हैं मयखाने में॥

नीरज जी ने की थी एक्टिंग :

दो रूपों में शायद उन्हें न के बराबर या बहुत कम पहचान मिली। शायद ही कोई जानता होगा कि गोपालदास नीरज एक अभिनेता थे। वास्तव में, 80 बरस की उम्र में उन्होंने ‘लाल किले का आख़िरी मुशायरा’ नाटक में बहादुर शाह जफ़र की भूमिका निभाई थी। तब उनका उत्साह किसी युवा जैसा दिखता था। वह गर्वमिश्रित चाव से बताते थे ‘थिएटर में सबसे अधिक उम्र में बतौर अभिनेता डेब्यू यानी पदार्पण करने वाला अभिनेता मैं हूं’ दिल्ली में इस नाटक के मंचन के बाद वह भोपाल पहुंचे थे और तब लगभग 17 साल पहले मैंने एक समाचार पत्र के लिए उनका एक साक्षात्कार इसी पक्ष को लेकर किया था। हालांकि वह इस नाटक के कुछ ही मंचन कर सके और इसके बाद कोई और नाटक खेल भी नहीं सके।

फिल्म फेयर पुरस्कार

गोपालदास नीरज को फ़िल्म जगत में सर्वश्रेष्ठ गीत लेखन के लिये1970 के दशक में लगातार तीन बार फिल्म फेयर पुरस्कार के लिए नामांकित किया गया-

  • 1970: काल का पहिया घूमे रे भइया! (फ़िल्म: चंदा और बिजली)

  • 1971: बस यही अपराध मैं हर बार करता हूँ (फ़िल्म: पहचान)

  • 1972: ए भाई! ज़रा देख के चलो (फ़िल्म: मेरा नाम जोकर)

इसमें वह 1970 का पुरस्कार जीते। उनका एक गीत ‘कारवां गुज़र गया’, पहले मंचों से ख्यातिलब्ध हुआ, फिर उनका एक गीत संग्रह इसी शीर्षक से छपकर आया। यह गीत जैसे उनकी प्रतिनिधि रचना या हस्ताक्षर या उनकी गीत यात्रा का पाथेय बन गई। इसी गीत की लोकप्रियता ने उन्हें सिनेजगत में स्थापित करने में महती भूमिका निभाई। तीन बार फिल्मफेयर का अवार्ड जीतने के बाद भी फक्कड़मिजाज नीरजजी को मुंबई रास नहीं आई। फिल्मों गीतों की बंदिशों को स्वीकार करना उनके कविमन के लिए कठिन था । लेकिन बहुत कम समय में भी उन्होंने कई यादगार फिल्मी गीत दिए जो आज भी लोगों की जुबान पर है |

पहली फिल्म से बने फेमस गीतकार :

कवि सम्मेलनों में लोकप्रियता के चलते नीरज को मुंबई के फिल्म जगत ने गीतकार के रूप में "नई उमर की नई फसल" के गीत लिखने का निमन्त्रण दिया जिसे उन्होंने बड़े हर्ष के साथ स्वीकार कर लिया था। पहली ही फ़िल्म में उनके लिखे कुछ गीत जैसे "कारवाँ गुजर गया" 'गुबार देखते रहे' और 'देखती ही रहो आज दर्पण न तुम, प्यार का यह मुहूरत निकल जायेगा' बेहद लोकप्रिय हुए जिसका परिणाम यह हुआ कि वे बम्बई में रहकर फ़िल्मों के लिये गीत लिखने लगे। फिल्मों में गीत लेखन का सिलसिला मेरा नाम जोकर, शर्मीली और प्रेम पुजारी जैसी अनेक चर्चित फिल्मों में कई वर्षों तक जारी रहा।

अब के सावन में शरारत ये मेरे साथ हुई, मेरा घर छोड़ के कुल शहर में बरसात हुई, हर गलत मोड़ पे टोका है किसी ने मुझको, एक आवाज तेरी जब से मेरे साथ हुई।

नीरज की हमेशा सुनाई जाने वाली पंक्तियां

4 जनवरी सन 1925 में हुआ था गोपालदास सक्सेना 'नीरज' का जन्म

गोपालदास सक्सेना 'नीरज' का जन्म 4 जनवरी 1925 आगरा व अवध उत्तर प्रदेश में इटावा जिले के ब्लॉक महेवा के निकट पुरावली गाँव में बाबू ब्रजकिशोर सक्सेना के यहाँ हुआ था। मात्र 6 वर्ष की आयु में पिता गुजर गये। 1942 में एटा से हाई स्कूल परीक्षा प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की उन्होंने कच्ची उम्र में ही उनको जिम्मेदारी का एहसास हुआ और उन्होंने शुरुआत में इटावा की कचहरी में कुछ समय टाइपिस्ट का काम किया उसके बाद सिनेमाघर की एक दुकान पर नौकरी करने लगे थे। लम्बे समय के बाद दिल्ली जाकर सफाई विभाग में टाइपिस्ट की नौकरी की। वहाँ से नौकरी छूट जाने पर कानपुर के डी०ए०वी कॉलेज में क्लर्की नौकरी ज्वाइन की थी।

नीरज की प्रकाशित कृतियाँ :

संघर्ष (1944) अन्तर्ध्वनि (1946) विभावरी (1948) प्राणगीत (1951) दर्द दिया है (1956) बादर बरस गयो (1957) मुक्तकी (1958) दो गीत (1958) नीरज की पाती (1958) गीत भी अगीत भी (1959) आसावरी (1963) नदी किनारे (1963) लहर पुकारे (1963) कारवाँ गुजर गया (1964) फिर दीप जलेगा (1970) तुम्हारे लिये (1972) नीरज की गीतिकाएँ (1987)।

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