लुप्त होते गिद्धों को मिला जीवन, इस जानलेवा दवा से घट रही गिद्धों की संख्या
गिद्ध संरक्षण प्रजनन केंद्र में गिद्धों की संख्या नियंत्रण का किया जा रहा प्रयास।सांकेतिक तस्वीर - Social Media

लुप्त होते गिद्धों को मिला जीवन, इस जानलेवा दवा से घट रही गिद्धों की संख्या

पैटर्न पाकिस्तान में भी देखा गया था। तब हमने संरक्षित गिद्धों के ऊतकों का अध्ययन किया और पाया कि उनमें से 76% की मृत्यु दवा के कारण हुई।

हाइलाइट्स –

  • शिकारी पक्षियों के पनाहगार

  • डॉ. युगल का गिद्ध सहेजने प्रयास

  • जहरीली दवा जानलेवा हो रही साबित

  • प्रजनन केंद्रों पर गिद्धों को मिला जीवन

राज एक्सप्रेस (Raj Express)। आकाश में मंडराते खतरनाक दिखने वाले गंजे शिकारी पक्षियों की परवाह करना हमारे लिए संभव नहीं है। बच्चों को हमेशा झपट्टा मारने में माहिर गिद्धों से दूर रहने की सख्त चेतावनी दी जाती है क्योंकि वे इंसानों को भी खा सकते हैं।

चिंतनीय अकाट्य सच -

इस मांसाहारी पक्षी के प्रति इस अवधारणा के कारण, जब गिद्धों की संख्या में गिरावट आई, तो 80 और 90 के दशक में इंसानों ने पलक तक नहीं झपकाई। इन मांस भक्षी पक्षियों की अनुमानित संख्या 40 मिलियन गिद्धों में तकरीबन 97 प्रतिशत तक की भारी कमी आई है!

संख्या गिरावट का प्रमुख कारण -

गिद्धों की संख्या में गिरावट का एक अहम कारण मवेशियों के इलाज में प्रयोग की जाने वाली दवा नासैड (NSAID) थी।

नॉन-स्टेरॉयडल एंटी-इनफ्लैमेटरी ड्रग (नासैड/NSAID) मतलब एक गैर-स्टेरॉयड सम्बन्धी सूजन-रोधी दवा से है। इसे डाइक्लोफेनेक (diclofenac) कहा जाता था, जिसका इस्तेमाल तब मवेशियों के इलाज के लिए किया जाता था।

जब गिद्धों ने इस दवा के असर वाले शवों को खाया, तो दवा उनके शरीर में प्रवेश कर गई, जिससे गुर्दे विफल हो गए। इस नुकसान का महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ा। अखाद्य शवों से पर्यावरणीय खतरे पैदा हुए हैं। ऐसे में चूहों और जंगली कुत्तों की बढ़ती संख्या से इंसानों के लिए बीमारी का खतरा बना हुआ है।

बॉम्बे नेचुरल हिस्ट्री सोसाइटी (बीएनएचएस/ BNHS) के उप निदेशक और प्रमुख वैज्ञानिक डॉ विभु प्रकाश, गिद्धों की संख्या में तेज गिरावट और इसके पीछे के कारक की पहचान करने वाले पहले लोगों में से एक थे।

वह भरतपुर, राजस्थान में केवलादेव राष्ट्रीय उद्यान में एक शोधकर्ता के रूप में तैनात थे। इस दौरान तब 1997 में 40 गिद्धों की मृत्यु हो गई थी। पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट के अनुसार, सभी मृत गिद्धों की गर्दन झुकी हुई थी और उनके अंगों में सफेद चाक के निशान थे।

"जमा खाद्य आंत के गठिया के संकेत थे। एक बार जब वे दवा खाते हैं, तो इससे यूरिक एसिड का निर्माण होता है जो आगे चलकर निर्जलीकरण का कारक बनता है।"

डॉ विभु

पाकिस्तान में भी यही आलम -

दबेटरइंडिया (thebetterindia) में प्रकाशित लेख में डॉ. विभु ने बताया कि उस समय इसी तरह का पैटर्न पाकिस्तान में भी देखा गया था। तब हमने संरक्षित गिद्धों के ऊतकों का अध्ययन किया और पाया कि उनमें से 76% की मृत्यु दवा के कारण हुई।

उन्होंने बताया कि इन दो सबूतों के आधार पर, हमारा अनुमान था कि अगर तत्काल कदम नहीं उठाए गए तो गिद्ध विलुप्त होने की कगार पर होंगे। इस समस्या के समाधान के लिए हमने, बीएनएचएस में एक प्रजनन केंद्र स्थापित करने का फैसला किया।

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जटायु संरक्षण प्रजनन केंद्र -

बीएनएचएस (BNHS) ने 2004 में पिंजौर में बीर शिकारगाह वन्यजीव अभयारण्य के बाहर गिद्धों के लिए जटायु संरक्षण प्रजनन केंद्र (जेसीबीसी/JCBC) स्थापित करने के लिए हरियाणा सरकार के साथ एक समझौता ज्ञापन (MoU) पर हस्ताक्षर किए।

त्रिस्तरीय रणनीति -

सुरक्षित वातावरण में गिद्धों के प्रजनन के लिए डॉ विभु और उनकी टीम ने त्रिस्तरीय संरक्षण रणनीति पर ध्यान केंद्रित किया। पहले चरण में, संरक्षणवादियों और शोधकर्ताओं की एक टीम ने डाइक्लोफेनाक पर प्रतिबंध लगाने के लिए सरकार से चर्चा की। उन्हें कैम्ब्रिज के प्रोफेसर राइस ग्रीन से वैज्ञानिक समर्थन भी मिला।

दवा की इतनी मात्रा काफी -

उनके अनुमान के अनुसार, शवों में मौजूद 0.8 प्रतिशत डाइक्लोफेनाक भी गिद्धों की मौत का कारण बनने के लिए पर्याप्त है। इस तथ्य की पुष्टि के लिए डॉ. विभु और उनकी टीम ने 2,000 से अधिक स्थानों से गिद्धों के नमूने लिए। इसकी जांच में शवों में औसतन 11 प्रतिशत डाइक्लोफेनाक मिला।

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साल 2006 में सफलता -

2006 में दवा पर प्रतिबंध लगा दिया गया। इससे गिद्धों के संवर्धन के प्रयास में डॉ. विभु की टीम को बड़ी सफलता मिली। उन्हें मेलोक्सिकैम (Meloxicam) में इसका एक विकल्प मिला। पिंजौर की टीम ने पशु चिकित्सकों के साथ एक परीक्षण किया और दवा को सुरक्षित पाया।

दूसरा और तीसरा कदम कृत्रिम रूप से प्रजनन एवं ऐसे (कृत्रिम) गिद्धों को सुरक्षित छोड़ने के लिए एक अनुकूल वातावरण की वकालत करना था।

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गिद्ध की इन प्रजातियों पर फोकस -

डॉ. विभु पत्नी डॉ. निकिता के साथ केंद्र में प्रमुख शोधकर्ता थे, जिसे रॉयल सोसाइटी फॉर द प्रोटेक्शन ऑफ बर्ड्स (आरएसपीबी/RSPB) का आर्थिक रूप से समर्थन प्राप्त था।

उन्होंने गुजरात, पश्चिम बंगाल और असम जैसे विभिन्न राज्यों से तीन जिप्स प्रजातियों के गिद्ध प्राप्त किए। इसमें दुबले-पतले गिद्ध, सफेद पीठ वाले गिद्ध और लंबी चोंच वाले गिद्ध शामिल थे।

जब गिद्धों की 97 प्रतिशत संख्या घटी, तो डॉ. विभु और निकिता ने इस तकनीक का इस्तेमाल उन सैकड़ों पक्षियों की प्रजातियों को सुरक्षित रूप से प्रजनन करने के लिए किया जो साल में केवल एक अंडा देती हैं।

इन तीन राज्यों में भी प्रजनन केंद्र -

केंद्र ने गिद्धों की संख्या बढ़ाने के लिए डबल-क्लचिंग और चिक स्वैपिंग तकनीकों जैसी कृत्रिम ऊष्मायन विधियों को अपनाया। इसके बाद के वर्षों में पश्चिम बंगाल, असम और मध्य प्रदेश में गिद्ध संरक्षण प्रजनन केंद्र शुरू किए गए।

साल में एक बार अंडा -

यहां यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि मादा गिद्धों के प्रजनन की प्रक्रिया बेहद धीमी होती है क्योंकि वे हर साल केवल एक अंडा देती हैं। गिद्ध प्रजनन तभी शुरू करते हैं जब वे अपनी प्रजातियों के आधार पर 5 या 6 वर्ष की आयु तक पहुंचते हैं और वे जीवन विस्तार के लिए संभोग करते हैं।

"यह वह जगह है जहां कृत्रिम ऊष्मायन एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।"

डॉ. निकिता

डॉ. निकिता ने बताया कि अगर किसी कारण से मादा गिद्ध द्वारा दिया गया अंडा खराब हो जाता है, तो मादा गिद्ध 3-4 सप्ताह के भीतर दूसरा अंडा देती है। इसलिए डबल क्लचिंग तरीका फायदेमंद रहा। हमने पहला अंडा लिया और उसे इनक्यूबेटर में रखा और 5-10 दिनों के बाद दूसरे क्लच अंडे के साथ घोंसले पर रख दिया।

दूसरे शब्दों में, पहला अंडा माता-पिता द्वारा पैदा किया गया था और दूसरे को नर्सरी में स्वैपिंग तकनीक के तहत पाला गया था।

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सफलता अब तक -

पिंजौर केंद्र में 10 अष्टकोणीय इनक्यूबेटर हैं जिन्हें आज भी हर चक्र के बाद सैनिटाइज किया जाता है। चार प्रजनन केंद्रों में आज भी विभिन्न प्रजातियों के 780 गिद्ध हैं। केंद्रों का साल 2034 का लक्ष्य तीन प्रजातियों में से प्रत्येक में 100 जोड़े रिलीज़ करना है। परियोजना के पहले 15 साल गिद्धों को पालने में और अगले 15 साल उन्हें स्वछंद व्यवहार के लिए तैयार करने में लगेंगे।

पर्यावरण के अनुकूल बनाने ट्रिक -

बंदी (captive) गिद्धों को जल्द से जल्द जंगल के अनुकूल बनने में मदद करने के लिए, शोधकर्ता जंगली गिद्धों को बकरी के मांस के माध्यम से प्रजनन केंद्रों के पास आकर्षित करते हैं।

मांस दोनों प्रकार के गिद्धों (जंगली एवं प्रजनन केंद्र के कृत्रिम) के लिए रखा जाता है ताकि वे मिलकर उसे खा सकें और एक दूसरे के साथ मिलाप कर सकें।

दवाओं पर प्रतिबंध और प्रजनन केंद्र नाकाफी -

डाइक्लोफेनैक के प्रतिबंध से आशातीत परिणाम मिले क्योंकि दवा का प्रचलन 2007 में 10 प्रतिशत से घटकर 2011 में 6 प्रतिशत हो गया था।

डॉ. विभु और उनकी टीम के शोध के अनुसार, सभी पशु चिकित्सकों ने दवा का उपयोग करना बंद कर दिया था, लेकिन आम पशु पालकों के पास खुराक की शीशियाँ अभी भी उपयोग में थीं। इस खामी का इस्तेमाल मवेशियों के लिए किया जा रहा था।

“हमने सरकार को शीशी के आकार को 10-15 मिली से घटाकर 3 मिली करने के लिए प्रेरित किया। 2015 में, अंततः आदेश पारित किया गया था। यह उम्मीद है कि भविष्य में, गिद्धों को बचाने के लिए शवों में दवा का प्रचलन 1 प्रतिशत या उससे कम होगा।”

डॉ विभु

आसान नहीं है डगर -

सभी प्रजनन केंद्रों के शोधकर्ताओं ने गिद्धों के लिए एक सुरक्षित वातावरण की पहचान करने के लिए अनुसंधान, परीक्षण और परिणामों में वर्षों बिताए हैं। दुर्भाग्य से, यह सब बहुत अधिक लागत पर हासिल होता है।

भोजन पर (गिद्धों के पिंजौर केंद्र में) 2.5 करोड़ रुपये खर्च करने से लेकर प्रजनन प्रक्रिया पर 4 करोड़ रुपये तक, धन उनकी यात्रा के लिए एक महत्वपूर्ण ईंधन है।

विभु कहते हैं, "आदर्श स्थिति यह है कि प्रजनन प्रक्रिया को पूरा करने के लिए पर्याप्त वित्तीय सहायता हो और यह सुनिश्चित किया जाए कि गिद्धों को छोड़ते समय कम से कम दो साल तक 100 किमी के दायरे में डायोफ्लेक (dioflec) का उपयोग न हो।"

डिस्क्लेमर – आर्टिकल प्रचलित रिपोर्ट्स पर आधारित है। इसमें शीर्षक-उप शीर्षक और संबंधित अतिरिक्त आवश्यक जानकारी जोड़ी गई हैं। इस आर्टिकल में प्रकाशित तथ्यों की जिम्मेदारी राज एक्सप्रेस की नहीं होगी।

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