वसीम जाफर ने सांप्रदायिक पूर्वाग्रह के आरोपों पर दिया जवाब, इनका मिला साथ
सांकेतिक चित्र- Social Media

वसीम जाफर ने सांप्रदायिक पूर्वाग्रह के आरोपों पर दिया जवाब, इनका मिला साथ

तो मैंने उन्हें अल्लाह-हू-अकबर कहने के लिए कहा होता। पढ़िये जाफर के समर्थन में किसने क्या लिखा -

हाइलाइट्स –

  • वसीम जाफर ने तोड़ी चुप्पी

  • कई दिग्गज क्रिकेटर्स का मिला साथ

  • CAU के आरोपों दिया जवाब

राज एक्सप्रेस। हाल ही में क्रिकेट एसोसिएशन ऑफ उत्तराखंड (CAU) के मुख्य कोच के रूप में अपना पद छोड़ने वाले वसीम जाफर ने टीम के साथ अपने कार्यकाल के दौरान सांप्रदायिक पूर्वाग्रह के आरोपों का खंडन किया है।

इनके आरोप खारिज -

उन्होंने क्रिकेट एसोसिएशन ऑफ उत्तराखंड (CAU) के सचिव महिम वर्मा (Mahim Verma) और टीम मैनेजर नवनीत मिश्रा (Navneet Mishra) के हवाले से प्रकाशित समाचारों में लगे तमाम आरोपों को सिरे से खारिज कर दिया।

क्या आरोप था? -

प्रकाशित खबर में उत्तराखंड के पूर्व मुख्य कोच वसीम जाफर पर सचिव महिम वर्मा और टीम मैनेजर नवनीत मिश्रा के हवाले से बायो-बबल में मौलवी की जरूरत, धर्म विशेष के खिलाड़ियों के चयन में पूर्वाग्रह रखने जैसे आरोप लगे थे। जाफर ने तमाम आरोपों को क्षुद्र (petty) मानसिकता वाला बताया है।

"जो आरोप लगाए गए हैं, वे गंभीर आरोप हैं ... मेरे खिलाफ जो सांप्रदायिक कोण लगाया गया है, वह बहुत दुखद है... आप सभी मुझे जानते हैं और मुझे देख चुके हैं एक लंबा समय है, इसलिए आप सभी जानते हैं कि मैं कैसा हूं।"

वसीम जाफर, पूर्व प्रथम श्रेणी भारतीय क्रिकेट खिलाड़ी (बल्लेबाज), निवर्तमान कोच (एक संवाददाता सम्मेलन में)

खिलाड़ी चयन का आरोप -

उन्होंने कहा, "जो आरोप (बल्लेबाजी क्रम के संबंध में) मुझ पर उछाले गए हैं मैंने ऐसा कभी कोई सुझाव नहीं दिया। सैयद मुश्ताक अली ट्रॉफी में जितने भी खिलाड़ी खेले, मैंने उन्हें अपने विश्वास पर खेला।”

उन्होंने टीम में चुने गए 22 खिलाड़ी में से तीन धर्म विशेष के होने की बात पर बल देते हुए कहा कि, "मैंने अंतिम मैच के लिए समद फालाह को भी ड्रॉप कर दिया। अगर मैं सांप्रदायिक होता, तो समद फालाह और मोहम्मद नाज़िम दोनों ही सारे मैच खेलते। इस बारे में कहना या सोचना बहुत ही क्षुद्र बात है। मैं नए खिलाड़ियों को अवसर देना चाहता था।"

तो बिष्ट को क्यों लाता? –

टीम में बिष्ट और अब्दुल्ला की कप्तानी पर लग रहे आरोपों पर भी अपना पक्ष रखा। इस बारे में उन्होंने चयनकर्ताओँ की भूमिका पर सवाल उठाते हुए कहा कि;

"अगर मैं सांप्रदायिक होता, तो मैं जय बिस्ट को एक पेशेवर के रूप में क्यों लाता? मैं भी उन्हें कप्तान बनाना चाहता था। यह चयनकर्ता थे जिन्होंने महसूस किया कि इकबाल अब्दुल्ला कप्तानी के लिए बेहतर उम्मीदवार थे क्योंकि वह वरिष्ठ थे और आईपीएल खेल चुके थे। मैं उनके सुझाव से सहमत था।”

धार्मिक उद्घोष -

उन्होंने उनके बारे में फैली उन अफवाहों को भी खारिज कर दिया जिसमें कहा जा रहा है कि उन्होंने खिलाड़ियों से "राम-भक्त हनुमान की जय" उद्घोष का उपयोग न करने का आग्रह किया।

"सबसे पहली बात, ये नारे (राम-भक्त हनुमान की जय) नहीं थे। जब हम अभ्यास मैच खेल रहे थे, तब ये खिलाड़ी 'रानी माता सच्चे दरबार की जय' कहते थे। मैंने उन्हें जय हनुमान, जय श्री राम कहते नहीं सुना। यह सिख समुदाय का एक मंत्र है और हम दो लोग वहां से थे, इसलिए वे ऐसा कहते थे।"

हम उत्तराखंड के लिए खेलते हैं -

मैच में किसी सफलता के मिलने पर लगने वाले उद्घोष पर भी उन्होंने स्थिति स्पष्ट की और पहलुओं पर प्रकाश डालते हुए कहा -

“जब हम बड़ौदा पहुंचे, तो मैंने उनसे (टीम से) कहा, हम एक समुदाय के रूप में नहीं खेल रहे हैं, हम उत्तराखंड के लिए खेल रहे हैं, इसलिए हमारा नारा उत्तराखंड के लिए होना चाहिए - 'गो उत्तराखंड' ('Go Uttarakhand') या 'लेट्स डू इट उत्तराखंड' ('Let's do it Uttarakhand') या 'कम ऑन उत्तराखंड' ('Come on Uttarakhand')।“

इसकी वजह बताते हुए पूर्व सलामी बल्लेबाज जाफर ने कहा कि "इस तरह से चंदू सर (चंद्रकांत पंडित) विदर्भ में काम करते थे, यह विचार तब से था जब टीम में शामिल 11-12 खिलाड़ी अलग-अलग धार्मिक मान्यताओँ से संबंधित थे।"

निराधार हैं आरोप -

उन्होंने बतौर कोच उन पर लगे पूर्वाग्रह के सभी आरोपों को अपने तर्कों से खारिज करते हुए कहा कि; "सभी आरोप झूठे और निराधार हैं, अगर कोई सांप्रदायिक कोण होता, तो मैंने उन्हें अल्लाह-हू-अकबर कहने के लिए कहा होता।”

मौलवी की एंट्री -

बायो-बबल में मौलवी को बुलाने के आरोप पर उन्होंने कहा कि; मौलवी को बुलाने का फैसला उनका नहीं था और यहां तक ​​कि आवश्यक अनुमति भी टीम मैनेजर नवनीत मिश्रा ने ही ली थी।

"मौलवी, मौलाना, जो शुक्रवार को आए थे, मैंने उन्हें नहीं बुलाया था और मौलाना को इक़बाल अब्दुल्ला ने बुलाया था। वह शायद देहरादून में किसी को जानते थे और शुक्रवार को जुम्मे की नमाज़ में एक सभा में प्रार्थना करते हैं।"

अगर मैं सांप्रदायिक होता, तो…

सांप्रदायिक पूर्वाग्रह, शुक्रवार की नमाज और बायो-बबल के उल्लंघन के मामले में भी उन्होंने अपनी प्रतिक्रिया कुछ इस तरह रखी।

"अगर मैं सांप्रदायिक होता, तो मैं सुबह 9 बजे अभ्यास कर सकता था और दोपहर 12 बजे इसे समाप्त कर सकता था, ताकि मैं दोपहर 1.30 बजे जा सकूं और नमाज अदा करूं क्योंकि जुम्मे की नमाज़ दोपहर 1.30-2.00 बजे होगी। केवल शुक्रवार के लिए इकबाल ने अनुमति ली।"

"केवल अभ्यास के बाद, केवल शुक्रवार को, ड्रेसिंग रूम के अंदर, हमने पांच मिनट के लिए नमाज़ अदा की। इससे आगे कुछ नहीं हुआ और जैव बुलबुले (bio bubble) का कभी भी उल्लंघन नहीं हुआ।”

ऐसे गर्माया मुद्दा -

यह मुद्दा मंगलवार को उनके पद से इस्तीफे के बाद शुरू हुआ, जिसमें उन्होंने क्रिकेट एसोसिएशन ऑफ उत्तराखंड के सचिव महिम वर्मा द्वारा टीम चयन में हस्तक्षेप का हवाला दिया था और यह भी उल्लेख किया था कि आगामी विजय हजारे ट्रॉफी के लिए टीम का फैसला करने से पहले चयनकर्ताओं द्वारा उनके विचार नहीं लिए गए थे।

"जब सैयद मुश्ताक अली टीम का चयन किया जा रहा था, तो मैं चार चयनकर्ताओं और सीईओ के साथ था।" सचिव नहीं थे। लेकिन विजय हजारे ट्रॉफी के लिए, मैं न तो बैठक का हिस्सा था और न ही मेरे साथ इस पर चर्चा की गई थी। यदि महिम वर्मा मुझे क्रिकेट में सुधार करने के लिए वहां ले गए थे, तो मुझे थोड़ी स्वतंत्रता की जरूरत थी। अगर तरह से यह हमेशा से चला आ रहा है, तो मुझे वहां जुड़ने का कोई मतलब नहीं था।"

जाफर को मिला साथ –

ट्विटर पर वसीम जाफर से जुड़ा सांप्रदायिक पूर्वाग्रह का मामला चर्चा का विषय बन चुका है। वसीम जाफर को अपनी टीम के साथी खिलाड़ियों का भरपूर साथ मिल रहा है। भारत के सफल स्पिनर अनिल कुंबले ने लिखा है “तुम्हारे साथ वसीम। सही काम किया।” लेकिन पहले पढ़ें खुद वसीम जाफर के ट्वीट को –

मामला दुर्भाग्यपूर्ण/CM करवाएं जांच -

इरफान पठान ने जहां इस घटना को दुर्भाग्यपूर्ण बताया है वहीं मनोज तिवारी ने वसीम जाफर को नेशनल हीरो बताकर उत्तराखंड के मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत से मुद्दे पर तुरंत ध्यान देने और आवश्यक कार्रवाई कर उदाहरण प्रस्तुत करने का अनुरोध किया है।

मीडिया के समक्ष जाफर ने कहा कि "यह (सांप्रदायिक पूर्वाग्रह) एक गंभीर आरोप है। और अगर वास्तव में एक सांप्रदायिक पूर्वाग्रह होता, तो मैं इस्तीफा नहीं देता, वे मुझे बर्खास्त कर देते।" उन्होंने निष्कर्ष निकालते हुए कहा।

डिस्क्लेमर आर्टिकल प्रचलित रिपोर्ट्स पर आधारित है। इसमें शीर्षक-उप शीर्षक और संबंधित अतिरिक्त प्रचलित जानकारी जोड़ी गई हैं। इस आर्टिकल में प्रकाशित तथ्यों की जिम्मेदारी राज एक्सप्रेस की नहीं होगी।

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