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भारतीयों के मौलिक अधिकार
भारतीयों के मौलिक अधिकार|Sayed Dabeer Hussaain- RE
दुनिया

10 दिसंबर को ही क्यों मनाया जाता है मानवाधिकार दिवस?

मानव अधिकार विश्व के सभी देशों में लागू होती है लेकिन प्रत्येक देश अपने आधार अपने नागरिकों के लिए मौलिक आधिकार तय करते हैं।

रवीना शशि मिंज

राज एक्सप्रेस। व्यक्ति की स्वतंत्रता, समानता और सम्मान के साथ जीवन जीने के हक को बचाए रखने के लिए 'मानवाधिकार आयोग' का गठन हुआ है।

'दिसंबर की 10 तारीख सार्वभौमिक मानव अधिकार का प्रतीक है। 10 दिसंबर सन् 1948 को संयुक्त राष्ट्र महासभा ने मानवाधिकार घोषणा पत्र को मान्यता दी थी और इसी दिन को बतौर मानवाधिकार दिवस के रूप में मनाया जा रहा है।'

मानव अधिकार विश्व के सभी देशों में लागू होता है लेकिन प्रत्येक देश अपने आधार अपने नागरिकों के लिए मौलिक आधिकार तय करते हैं।

वर्ल्ड ह्यूमन राइट्स डे पर जानिए भारतीयों के मौलिक अधिकारों के बारे में-

हमारे मौलिक अधिकार।
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भारत के संविधान में 6 मौलिक अधिकारों का विवरण है।

  1. समानता का अधिकार,

  2. स्वतंत्रता का अधिकार,

  3. शोषण के खिलाफ बोलने का अधिकार,

  4. धर्म की स्वतंत्रता का अधिकार,

  5. सांस्कृतिक और शैक्षिक अधिकार

  6. संवैधानिक उपचारों का अधिकार।

1.समता या समानता का अधिकार -

'जाति, लिंग, धार्मिक विश्वास या जन्म स्थान के आधार पर कोई भेदभाव नहीं होगा।

भारतीय संविधान

भारतीय कानून के अनुच्छेद (14-18) में देश के नागरिकों को समानता का अधिकार है।

जाति आधारित समानता - देश में जातिवाद की समस्या पुरानी है। इस समस्या को दूर करने के लिए संविधान निर्माता बाबा साहेब अंबेडकर ने संविधान में जाति आधारित समानता का उल्लेख किया है।

संविधान में प्रावधान के बावजूद भी देश से जातिवाद की जड़ अभी भी पूरी तरह से उखड़ी नहीं है। आज भी कई गाँवों और कस्बों में सेहरा पहने, घोड़ी पर सवार, बारात निकालते उस दलित दूल्हे को इसलिए पीट दिया जाता है क्योंकि वह दलित है।

कुछ निम्न लोगों की तुच्छ मानसिकता के अनुसार दलितों को सभ्य जिंदगी जीने का हक नहीं है। ऐसी घटनाएं मौलिक अधिकारों का उल्लंघन ही है लेकिन उपर्युक्त घटनाएं गाँवों और कस्बों तक की सीमित है। शहरों में ये घटनाएं नहीं घटती।

क्रमश: एक और उदाहरण हाल ही में, सितंबर माह में मध्यप्रदेश में दो दलित बच्चों की इसलिए हत्या कर दी गई, क्योंकि वो सड़क पर शौच कर रहे थे। पीड़ित परिवार का कहना है कि, उनके घर में शौचालय नहीं है। पंचायत में उनके घर में शौचालय निर्माण के लिए रूपए आए थे लेकिन फिर भी निर्माण नहीं किया गया। इसलिए मजबूरन सभी को बाहर शौच के लिए जाना पड़ता है।

'मानव अधिकार आश्वास्त करता है कि, किसी भी व्यक्ति के साथ भेदभाव या अमानुषिक कृत्य नहीं हो।'

लैंगिक समानता - हमारा संविधान लैंगिक असामनता के खिलाफ है, सभी लिंग को समान अधिकार सुनिश्चित हो, इसलिए संविधान में इसका विशेष ध्यान रखा गया है।

लेकिन ग्राउंड रिपोर्ट्स, देश में महिलाओं की हालात कुछ और ही बयां करती हैं।

देश में महिलाओं की एक बड़ी आबादी आज भी अपने अधिकारों से वंचित हैं। कई लड़कियां कच्ची उम्र में शिक्षा छोड़ने को मजबूर हैं। देश के दूसरे पेशे को तो छोड़ ही दीजिए, हमारे पार्लियामेंट हाउस में ही महिलाओं की संख्या की गिनती आप उंगलियों में कर लेंगे। महिला आरक्षण बिल जो महिलाओं को पार्लियामेंट के दोनों सदनों में 33% आरक्षण देने की बात कहता है, वो 2010 से राज्यसभा में ही अटका पड़ा है।

क्या हमारे नेता नहीं चाहते की देश की महिलाएं आगे बढ़े ?

देश में महिलाओं को नौकरी इसलिए नहीं दी जाती क्योंकि उसकी शादी के बाद उसके गर्भावस्था के दौरान उसे मैटरनिटी लीव देना होगा और इन छुट्टियों के बदले आप उनकी पगार नहीं काट सकते।

देश में महिलाओं के संदर्भ में एक और सबसे गंभीर और विचारणीय समस्या है यहाँ बढ़ते रेप और क्राईम। तथ्य बतातें हैं कि, भारत में हर 20 मिनट में एक महिला या बच्ची का रेप होता है। लेकिन प्रशासन इस समस्या के हल के लिए क्या कर रही है?

ये तो हो गई महिलाओं की बात। इस देश में एक और लिंग है जो हाशिए पर है- ट्रांसजेंडर्स।

देश में अब जाकर ट्रांसजेंडर के अधिकारों, उनके खिलाफ होने वाली नाइंसाफी को मद्देनज़र ट्रांसजेंडर पर्सन्स (प्रोटेक्शन ऑफ राइट्स) बिल पारित किया गया। उम्मीद है कि, इस बिल का, बरसों से हाशिए पर रहे ट्रांसजेंडर्स का फायदा होगा।

2. स्वतंत्रता का अधिकार -

अनुच्छेद 19-22 में स्वतंत्रता के पैमाने का विवरण मिल जाएगा। 'स्वतंत्रता का अधिकार' को 6 हिस्सों में वर्गीकृत किया गया है-

  • बोलने की स्वतंत्रता ( प्रेस की स्वतंत्रता इसी में शामिल है)

  • शांतिपूर्वक बिना हथियारों के एकत्रित होने और सभा करने की स्वतंत्रता

  • संघ बनाने की स्वतंत्रता

  • देश के किसी भी क्षेत्र में आवागमन की स्वतंत्रता

  • देश के किसी भी क्षेत्र में निवास करने और बसने की स्वतंत्रता

  • संपत्ति का अधिकार

अभी कुछ सालों में देखा गया है कि, लोग सबसे ज्यादा बोलने या अभिव्यक्ति की आजादी को लेकर चिंतित हैं। जहाँ टीवी चैनलों के डिबेट्स में देश में हो रही अस्वीकृत घटनाओं पर अपने विचार रखने पर उसे द्रेशद्रोह का टैग थमाया जा रहा है या उसे पड़ोसी देश में बसने की नसीहत दी जा रही है।

अधिकारों के लिए और गलत के खिलाफ बोलने के लिए पत्रकार या आमजन की हत्या कर दी जाती है। ये तो संविधान के प्रावधानों को उल्लंघन है।

लेकिन संविधान के प्रावधानों का उल्लंघन तब भी होता है, जब बोलने की आजादी के नाम पर लोग भारत तेरे टुकड़े होंगे जैसे नारों को जन्म दे रहे हैं। बोलने की आजादी का मतलब ये तो नहीं है कि, आप-अपने देश या किसी व्यक्ति विशेष के खिलाफ अमर्यादित शब्दों का उपयोग करें।

3. शोषण के खिलाफ अधिकार-

संविधान प्रत्येक व्यक्ति को अपने साथ हो रहे शोषण के खिलाफ आवाज़ उठाने की आज़ादी देता है।

शोषण की कोई परिभाषा नहीं है। इंसान अनेक तरीके से शोषित हो सकता है। बाल श्रम शोषण है, काम करवाने के बाद पगार नहीं देना भी शोषण है, मानव तस्करी आदि ये सब शोषण की श्रेणी में आते हैं। संविधान में ये सब तरह के शोषण के खिलाफ सज़ा का प्रावधान है।

जरूरी नोट- जरूरत पड़ने पर राष्ट्रीय सेवा करने के लिए बाध्य किया जा सकता है।

4. धार्मिक स्वतंत्रता

विश्व में भारत एकमात्र ऐसा देश है, जहाँ धर्म में विविधताएं देखने को मिलेंगी। देश में हर धर्म के लोग भाईचारे और सौहार्दपूर्ण तरीके से गुजर- बसर कर रहे हैं।

धर्म में विविधताओं को देखते हुए सभी धर्मों को संविधान में स्वतंत्रता दी गई है। जानिए धार्मिक स्वतंत्रता के अनुच्छेद के बारे में-

भारत की संविधान का अनुच्छेद (25-28) के अंतर्गत धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार का विवरण है।

अनुच्छेद 25:

धर्म को स्वतंत्र रूप से मानने, आचरण और प्रचार करने की स्वतंत्रता।

अनुच्छेद 26:

व्यक्ति को अपने धर्म के लिए संस्थाओं की स्थापना व पोषण करने, विधि-सम्मत सम्पत्ति के अर्जन करने और स्वामित्व एंव प्रशासन का अधिकार है।

अनुच्छेद 27:

राज्य किसी भी व्यक्ति को ऐसे 'कर' देने के लिए बाध्य नहीं कर सकता है, जिसकी आय किसी विशेष धर्म अथवा धार्मिक संप्रदाय की उन्नति या पोषण में व्यय करने के लिए विशेष रूप से निश्चित कर दी गई है।

अनुच्छेद 28:

राज्य से मिलने वाली निधि : पोषित किसी शिक्षा संस्था में धार्मिक शिक्षा नहीं दी जाएगी। ऐसे शिक्षण संस्था अपने विद्यार्थियों को किसी धार्मिक अनुष्ठान में भाग लेने या किसी धर्मोपदेश को बोलने या सुनने हेतु बाध्य नहीं कर सकते।

5. सांस्कृतिक और शैक्षिक अधिकार

संविधान के अनुच्छेद (29-30) में सांस्कृतिक और शैक्षिणक अधिकारों के बारे में बताया गया है।

अनुच्छेद 29: अल्पसंख्यकों के हितों का संरक्षण करने के लिए अल्पसंख्यक वर्ग अपनी भाषा, लिपि और संस्कृति को सुरक्षित रख सकता है और केवल भाषा, जाति, धर्म और संस्कृति के आधार पर उसे किसी भी सरकारी शैक्षिक संस्था में प्रवेश से नहीं रोका जा सकता।

अनुच्छेद 30: शिक्षा संस्थाओं की स्थापना और प्रशासन करने का अल्पसंख्यक वर्गों का अधिकार। अल्पसंख्यक वर्ग अपनी पसंद की शैक्षणिक संस्था का संचालन कर सकता है और सरकार भी उसे अनुदान देने में किसी भी तरह का भेदभाव नहीं कर सकती है।

6.संवैधानिक उपचारों का अधिकार

यदि किसी व्यक्ति को लगता है कि, संविधान द्वारा स्थापित मौलिक अधिकारों का प्रशासन या किसी संस्थान द्वारा उल्लंघन या हनन हो रहा है तो, वह उच्च न्यायालय या सर्वोच्च न्यायालय की शरण ले सकता है।

वहीं उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय इस संबंध में निर्देश जारी कर, नागरिकों के मौलिक अधिकारों की रक्षा करते हैं।

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